इस दिवाली

(सभी को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाऐं। आज हम सब सीख लेते हैं भगवान राम के जीवन एवं उनके विचारों से और इस त्योहार को अदिव्तीय बनाते हैं।)


कभी डगमग-डगमग आप हुए, 
लेकिन अथक चलते गए।
राह मे अनेकों व्यक्तित्व मिले,
अच्छे एवं बुरे,सभी के साथ चले।

रास्ते मे सबको गले लगाया,
मैत्री के स्वरूप को अपनाया।
सीखा की जब, 
न टिक पाई दशानन की स्वर्ण नगरी,
तो व्यर्थ है बने रहना अहंकारी।

परिजन हो या बैरी या सखा,
बुरा-भला किसी को न कहा।
इतिहास से सीखा कि,
जभी क्रोध में कुछ भी किया,
हमेशा नाश मनुष्य पर झाया। 
तभी सहनशीलता के अर्थ को समझा,
और सबको इसका मोल बताया।

शबरी के बेर को राम ने स्वीकारा,
छूत-अछूत के भेद को नकारा।
मानवता का यह पाठ कहीं न मिला,
साध्य बुजुर्ग को जब असाध्य प्रेम मिला।

आऔ लेते हैं प्रण इस दिवाली,
मिटाते हैं सारे अवगुण की निशानी।
हटा देते हैं धर्म आदि के भेद-भाव,
मनाते यह त्योहार सर्व धर्म समभाव।



-अश्वनी शुक्ल
   14/11/2020

Comments

  1. सहनशीलता की सार्थकता बताती यह पंक्तियां आज के संदर्भ में मानवता की रक्षा के लिए समाज के बुराइयों को दूर करने वाली है अति उत्तम विचार

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